बुधवार, 5 अगस्त 2020

भाई दूज कितनी सहायक

  भाई दूज कितनी सहायक
भाई दूज का त्योहार दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन विगीता बहनें भाई बहन अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करती है, और गोबर से भाई दूज परिवार का निर्माण कर, उसका पूजन अर्चन कर भाई को प्रेम पूर्वक भोजन कराती है। 











बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। भाई दूर से जुड़ी कुछ मान्यताएँ हैं जिनके आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग तरह से मनाया जाता है।
लेकिन क्या प्राकृतिक आपदाओं के समय कोई भी भाई बहन की रक्षा नहीं कर पाता है। उस समय तो पूर्ण परमात्मा ही है जो इस पूरे विश्व की रक्षा करते हैं। आत्मा के असली रक्षक पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी हैं।


असली गार्ड यानी पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब को पहचान कर उनकी भक्ति की जाएगी तो कोई भी भाई व बहन अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा।
असली गार्ड की पूरी जानकारी के लिए निश्चित रूप से देखिए ईश्वर टीवी रात 08:30 बजे।

बुधवार, 15 जुलाई 2020

नाग पूजा कितनी लाभदायक है?

नाग पूजा कितनी लाभदायक हैं?
नाग पुजा का त्यौहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है. 
पौराणिक काल से ही नागों को देवता के रूप में पूजा जाता रहा है. इसलिए नाग पंचमी के दिन नागो का पूजन किया जाता है देश के अलग-अलग स्थानों पर नाग पंचमी की पूजा अलग-अलग तरीके से की जाती है। 
 नाग पंचमी
भारत देश एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं यहां पर जितने भी पशु या पक्षी है उनको देवता के रूप में पूजा जाता है लेकिन क्या यह पूजा हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित है या यूं ही हम लोकवेद के आधार पर यह साधना करते जा रहे हैं इसका निर्णय हमारे शास्त्र ही प्रमाणित करते हैं कि हमें कौन सी पूजा या साधना करनी चाहिए कौन सी नहीं करनी चाहिए इसके लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं। हिंदू धर्म में जो शास्त्र है उनमें प्रथम नाम श्रीमद भगवत गीता का आता है उनके बाद चार वेद है  यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद, ऋग्वेद, इन चारों का सारांश ही भगवत गीता है। श्री भगवत गीता के अध्याय 16 के श्लोक 23 व 24 में गीता ज्ञान दाता अर्जुन को कह रहे हैं कि जो शास्त्र विधि को त्याग कर मन माना आचरण यानी कि 
लोकवेद के आधार पर जो भक्ति साधना करते हैं उनको ना तो कोई लाभ ना कोई सुख ना उनकी की कोई गति होती है इसलिए कौन सी भक्ति करनी चाहिए कौन सी नहीं शास्त्र ही प्रमाण है।
नाग पूजा
 श्री भगवत गीता में दो भगवानों की भक्ति बताई गई है भगवत गीता अध्याय 8 के श्लोक 13 में ॐ मंत्र जो कि ब्रह्म का है इसका जाप करने से ब्रह्मलोक प्राप्ति होती है ब्रह्मलोक प्राप्त प्राणी ही 8 वें अध्याय के श्लोक 16 में लिखा है कि वह पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।
 इसी भगवत गीता के  अध्याय 17 के श्लोक 23 में ॐ तत् सत यह मंत्र पूर्ण परमात्मा का बताया है जिसे पूर्ण गुरु से प्राप्त करके मर्यादा पूर्वक भक्ति करने से वह परमात्मा व उसका सनातन धाम यानी सतलोक प्राप्त होता है जहां जाने के बाद साधक के जन्म मृत्यु का घोर कष्ट पूर्ण रूप से दूर हो जाता है। वर्तमान में पूर्ण गुरु भारत की पवित्र धरती पर केवल संत रामपाल जी महाराज ही है क्योंकि संत रामपाल जी महाराज जी ने ही सभी धर्म ग्रंथों से यह प्रमाणित किया है कि सत भक्ति व पूजा केवल पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की ही करनी चाहिए बाकी जितने भी 33 करोड़ देवी देवता है वह आदरणीय है पूजनीय नहीं है। 

अधिक जानकारी के लिए कृपया अवश्य सुने 
संत रामपाल जी महाराज जी के मंगल प्रवचन 
    साधना चैनल शाम 7:30 से 8:30 तक।

बुधवार, 8 जुलाई 2020

सही शिक्षा क्या है?

 सही शिक्षा क्या है?
 शिक्षा मानव जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक है। 
आज जो मनुष्य का विकास दिखाई दे रहा है
शिक्षा का परिणाम 
Education

आदिकाल से ही मानव सीखता आ रहा है स्वतंत्रता से पूर्व हमारे देश भारत में शिक्षा के साधन सीमित थे और शिक्षा ग्रहण करना बहुत कठिन था स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई साधनों में वृद्धि हुई और जनसाधारण के लिए शिक्षा का अध्ययन करना सुगम हो गया राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आज भी कोई  परिवर्तन दिखाई नहीं देता राष्ट्रीय शिक्षा नीति में परिवर्तन होना अति आवश्यक है हमारी सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति2001 मैं परिवर्तन की बात करते हैं किंतु वास्तविकता यह है कि शिक्षा प्रणाली में  परिवर्तन का प्रयास नहीं किया जा रहा है वर्तमान शिक्षा प्रणाली में दोष निकाले जा रहे हैं किंतु उन्हें दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने के  प्रयास नहीं किये जा रहे हैं  उदाहरण के लिए  शिक्षा के साथ आध्यात्मिकता को जोड़ना बहुत जरूरी है क्योंकि मानव आध्यात्मिक ज्ञान ना होने के कारण वह शिक्षा इसीलिए  ग्रहण करते हैं कि किसी भी  भविष्य में अच्छी डिग्री प्राप्त करके डॉक्टर इंजीनियर और भी कई बड़ी-बड़ी पोस्ट पर नौकरी हासिल करके बड़े-बड़े मकान बनाना गाड़ी घोड़ा वह आदि ऐसो आराम के साज - बाज  से अपने जीवन को बर्बाद कर देना होता है।
Importance of Education
आध्यात्मिक ज्ञान से  मनुष्य को अपने मूल उद्देश्य की जानकारी होगी जो अब वह निश्चित ही भूल चुका है मानव जीवन का मूल उद्देश्य क्या है? क्यों यहां हम जन्म से मरते हैं? क्यों 84 लाख योनियों  जिसमें कीट पतंग पशु-पक्षियों के शरीरों में कष्ट उठाना पड़ता है? क्यों एक पल में तो हमारे पास भाई बहन मां पिता पत्नी बच्चे सब कुछ होता है वही दूसरे पल में सब बिछड़ जाता है कहीं भूकंप आ जाता है कहीं बाढ़ आ जाती है कहीं आग लग जाती है  जिसमें सब जलकर राख हो जाता है सब नष्ट हो जाता है ऐसा क्यों होता है यह जानकारी हमें आध्यात्मिक ज्ञान से मिलती है वर्तमान में आध्यात्मिक ज्ञान या यूं कहें आध्यात्मिक शिक्षा केवल
पूर्ण संत रामपाल जी महाराज जी के पास ही है वही एक आध्यात्मिक शिक्षक हैं जो भारत ही नहीं पूरे विश्व को आध्यात्मिक शिक्षा देकर एक नेक इंसान बनाना चाहते हैं जो कभी कोई बुराई ना करें रिश्वत ना ले चोरी जारी से बिल्कुल दूर रहे वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा लेकर लाखों अनुयायियों ने समाज में व्याप्त अनेकों बुराइयों को जैसे शराब पीना कई प्रकार  के नशे करना चोरी करना रिश्वत लेना दहेज लेना आदि आदि सभी  बुराइयों को जड़ से खत्म कर दिया है इसलिए आज शिक्षा के साथ आध्यात्मिक शिक्षा का होना अति आवश्यक है संत रामपाल जी महाराज जी ने मानव कल्याण के लिए अनेको आध्यात्मिक पुस्तकें  जैसे
 ज्ञान गंगा, जीने की राह, परिभाषा प्रभु की, लिखी है जिसे पढ़कर मनुष्य अपने मूल उद्देश्य को जान सकता है और इस जन्म मरण के दीर्घ रोग से छुटकारा पा सकता है।
TrueGuru
कृपया अधिक जानकारी के लिए संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन साधना चैनल शाम 7:30 से 8:30 तक अवश्य देखें

बुधवार, 1 जुलाई 2020

सत्य परमात्मा कौन है?

सत्य परमात्मा कौन है 

 प्रभु - स्वामी - ईश - राम - खुदा अल्लाह - रब - मालिक - साहेब - देव - भगवान - गॉड। यह परमात्मा के सर्व शक्ति बोधक शब्द है जो भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न भाषाओं में उच्चारण किए व लिखे जाते हैं।
परमात्मा की महिमा से प्रत्येक प्राणी प्रभावित है कोई शक्ति है जो परम सुखदायक व कष्ट निवारक है।
 जो शक्ति अंधे को आँखे प्रदान करें, गूंगे को आवाज, बहरे को कानों से श्रवण करवा दे, बांझ को पुत्र दे, निर्धन को धनवान बना दे, रोगी को स्वस्थ करें, जिसके कारण यदि  दर्शन हो जाए तो अति आनंद हो  जो सर्व  ब्रह्मांडो का रचनहार,  पूर्ण शांति दायक,  जगतगुरु तथा सर्वज्ञ है। जिसकी आज्ञा बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। अर्थात सर्वशक्तिमान जिसके सामने कुछ भी असंभव नहीं, ऐसे गुण जिसमें है वह वास्तव में परमात्मा, स्वामी - राम - भगवान - खुदा - अल्लाह - रहीम - रब -  गॉड कहलाता है।

अब विचारणीय विषय यह है कि परमात्मा कौन है? तथा कैसा है? वह किसने देखा है?

 जिन जिन पुण्य आत्माओ ने परमात्मा को प्राप्त किया परमात्मा को देखा उन्होंने बताया कि सबका मालिक एक है।  व उनके नाम संत गरीबदास जी छुड़ानी वाले, संत मलूक दास जी, संत घीसा दास जी, धनी धर्मदास जी, शिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव जी इन्होंने अपनी वाणी में बताया है कि परमात्मा मानव सदृश्य तेजोमय शरीर युक्त हैं जिसके एक रोम कूप में करोड़ सूर्य तथा चंद्रमा की रोशनी से अधिक प्रकाश है।

परमात्मा का वास्तविक नाम अपनी-अपनी भाषाओं में कविदेव (वेदों में संस्कृत भाषा में) तथा हक्का कबीर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में पृष्ठ नंबर 721 पर क्षेत्रीय भाषा में, तथा  सत कबीर श्री धर्मदास जी की वाणी में क्षेत्रीय भाषा में, तथा 
बंदीछोड़ कबीर साहेब, संत गरीबदास जी के सद ग्रंथ में क्षेत्रीय भाषा में, 
कबीरा कबीरन खबीरा खबीरन श्री कुरान शरीफ सूरह फुरकान नंबर 25 आयत नंबर 19, 21, 52 , 58 , 59 , में क्षेत्रीय अरबी भाषा में इसी पूर्ण परमात्मा के उपमात्मक नाम अनामी पुरुष, अगम पुरुष, अलख पुरुष, सतपुरुष,  अकाल मुर्ति, शब्द स्वरूपी राम, पूर्णब्रह्म, परम अक्षर ब्रह्म, आदि है।

गुरुवार, 25 जून 2020

काशी में करोत की कथा

काशी में करोत की कथा
शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण करने यानि शास्त्रों में लिखी भक्ति विधि अनुसार साधना न करने से गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि उस साधक को न तो सुख की प्राप्ति होती है, न भक्ति की शक्ति (सिद्धि) प्राप्त होती है, न उसकी गति (मुक्ति) होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है। हिन्दु धर्म के धर्मगुरू जो साधना साधक समाज को बताते हैं, वह शास्त्र प्रमाणित नहीं है। जिस कारण से साधकों को परमात्मा की ओर से कोई लाभ नहीं मिला जो भक्ति से अपेक्षित किया।   

फिर धर्मगुरूओं ने एक योजना बनाई कि भगवान शिव का आदेश हुआ है कि जो काशी नगर में प्राण त्यागेगा, उसके लिए स्वर्ग का द्वार खुल जाएगा। वह बिना रोक-टोक के स्वर्ग चला जाएगा। जो मगहर नगर (गोरखपुरके पास उत्तरप्रदेश में) वर्तमान में जिला-संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में है, उसमें मरेगा,वह नरक जाएगा या गधे का शरीर प्राप्त करेगा। गुरूजनों की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अनुयाईयों का परम धर्म माना गया है। इसलिए हिन्दु लोग अपने-अपने माता-पिता को आयु के अंतिम समय में काशी (बनारस) शहर में किराए पर मकान लेकर छोड़ने लगे।यह क्रिया धनी लोग अधिक करते थे। धर्मगुरूओं ने देखा कि जो यजमान काशी में रहनेलगे हैं, उनको अन्य गुरूजन भ्रमित करके अनुयाई बनाने लगे हैं। काशी, गया, हरिद्वार आदि-आदि धार्मिक स्थलों पर धर्मगुरूओं (ब्राह्मणों) ने अपना-अपना क्षेत्र बाँट रखा है। यदि कोई गुरू अन्य गुरू के क्षेत्र वाले यजमान का क्रियाकर्म कर देता है तो वे झगड़ा कर देते हैं। मारपीट तक की नौबत आ जाती है। वे कहते हैं कि हमारी तो यही खेती है, हमारा निर्वाह इसी पर निर्भर है। हमारी सीमा है। इसी कारण से काशी के शास्त्र विरूद्ध साधना कराने वाले ब्राह्मणों ने अपने यजमानों से कहा कि आप अपने माता-पिता को हमारे घर रखो। जो खर्च आपका मकान के किराए में तथा खाने-पीने में होता है, वह हमें दक्षिणा रूप में देते रहना।

हम इनकी देखरेख करेंगे। इनको कथा भी सुनाया करेंगे। उनके परिवार वालों को यह सुझाव अति उत्तम लगा और ब्राह्मणों के घर अपने वृद्ध माता-पिता को छोड़ने लगे और ब्राह्मणों को खर्चे से अधिक दक्षिणा देने लगे। इस प्रकार एक ब्राह्मण के घर प्रारम्भ में चार या पाँच वृद्ध रहे। अच्छी व्यवस्था देखकर सबने अपने वृद्धों को काशी में गुरूओं के घर छोड़ दिया। गुरूओं ने लालच में आकर यह आफत अपने गले में डाल तो ली, परंतु संभालना कठिन हो गया। वहाँ तो दस-दस वृद्ध जमा हो गए। कोई वस्त्रों में पेशाब कर देता, कोई शौच आँगन में कर देता। यह समस्या काशी के सर्व ब्राह्मणों को थी। तंग आकर एक षड़यंत्र रचा। गंगा दरिया के किनारे एकान्त स्थान पर एक नया घाट बनाया। उस पर एक डाट (तबी) आकार की गुफा बनाई। उसके बीच के ऊपर वाले भाग में एक लकड़ी चीरने का आरा यानि करौंत दूर से लंबे रस्सों से संचालित लगाया। उस करौंत को पृथ्वी के अंदर  रस्सों से लगभग सौ फुट दूर से मानव चलाते थे। ब्राह्मणों ने इसी योजना के तहत नया समाचार अपने अनुयाईयों को बताया कि परमात्मा का आदेश आया है। पवित्र गंगा दरिया के किनारे एक करौंत परमात्मा का भेजा आता है। जो शीघ्र स्वर्ग जाना चाहता है, वह करौंत से मुक्ति ले सकता है। उसकी दक्षिणा भी बता दी। वृद्ध व्यक्ति अपनी जिंदगी से तंग आकर अपने पुत्रों से कह देते कि पुत्रो! एक दिन तो भगवान के घर जाना ही है, हमारा उद्धार शीघ्र करवा दो। इस प्रकार यह परंपरा जोर पकड़ गई।बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह परमात्मा का चमत्कार चढ़ गया। अपने-अपने वृद्धों को उस करौंत से कटाकर मुक्ति मान ली। यह धारणा बहुत दृढ़ हो गई। कभी-कभी उस करौंत का रस्सा अड़ जाता तो उस मरने वाले से कह दिया जाता था कि तेरे लिए प्रभु का आदेश नहीं आया है। एक सप्ताह बाद फिर से किस्मत आजमाना। इस तरह की घटनाओं से जनता को और अधिक विश्वास होता चला गया। जिसके नम्बर पर करौंत नहीं आता था, वह दुःखी होता था। अपनी किस्मत को कोसता था। मेरा पाप कितना अधिक है। मुझे परमात्मा कब स्वीकार करेगा? वे पाखण्डी उसकी हिम्मत बढ़ाते हुए कहते थे कि चिन्ता न कर, एक-दो दिन में तेरा दो बार नम्बर लगा देंगे। तब तक रस्सा ठीक कर लेते थे और हत्या का कामजारी रखते थे। इसको काशी में करौंत लेना कहते थे और गारण्टिड 
(जिम्मेदारी व विश्वास के साथ) मुक्ति होना मानते थे। स्वर्ग प्राप्ति का सरल तथा जिम्मेदारी के साथ होना माना जाता था जबकि यह अत्यंत निन्दनीय अपराधिक कार्य था।

सच्चा सतगुरु वही है जिसके द्वारा बताई गई भक्ति विधि शास्त्र प्रमाणित हो।
शास्त्र प्रमाणित भक्ति पूरे विश्व में केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है।

शुक्रवार, 12 जून 2020

श्रीमद्भगवदगीता_के_गूढ़_रहस्य

श्रीमद्भगवदगीता_के_गूढ़_रहस्य

गीता अध्याय 16 श्लोक 23
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से
मनमाना आचरण करता है..
वह न सिद्धि को प्राप्त होता है।
न उसे कोई सुख प्राप्त होता है,
न उसकी गति यानि मुक्ति होती है
अर्थात्

शास्त्र के विपरित भक्ति करना व्यर्थ है।




वास्तविक भक्ति विधि के लिए गीता ज्ञान दाता प्रभु (ब्रह्म) किसी तत्वदर्शी की खोज करने को कहता है (गीता अध्याय 4 श्लोक 34) इस से सिद्ध है गीता ज्ञान दाता (ब्रह्म) द्वारा बताई गई भक्ति विधि पूर्ण नहीं है।


गीता अध्याय 15 के श्लोक 4 में कहा है कि उस तत्वदर्शी संत के मिल जाने के पश्चात् उस परमेश्वर के परम पद की खोज करनी चाहिए अर्थात् उस तत्वदर्शी संत के बताए अनुसार साधना करनी चाहिए जिससे पूर्ण मोक्ष(अनादि मोक्ष) प्राप्त होता है। गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मैं भी उसी की शरण में हूँ।

भाई दूज कितनी सहायक

  भाई दूज कितनी सहायक भाई दूज का त्योहार दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन विगीता बहनें भाई बहन अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर ...