श्रीमद्भगवदगीता_के_गूढ़_रहस्य
गीता अध्याय 16 श्लोक 23
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से
मनमाना आचरण करता है..
वह न सिद्धि को प्राप्त होता है।
न उसे कोई सुख प्राप्त होता है,
न उसकी गति यानि मुक्ति होती है
अर्थात्
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से
मनमाना आचरण करता है..
वह न सिद्धि को प्राप्त होता है।
न उसे कोई सुख प्राप्त होता है,
न उसकी गति यानि मुक्ति होती है
अर्थात्
शास्त्र के विपरित भक्ति करना व्यर्थ है।
वास्तविक भक्ति विधि के लिए गीता ज्ञान दाता प्रभु (ब्रह्म) किसी तत्वदर्शी की खोज करने को कहता है (गीता अध्याय 4 श्लोक 34) इस से सिद्ध है गीता ज्ञान दाता (ब्रह्म) द्वारा बताई गई भक्ति विधि पूर्ण नहीं है।


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