शुक्रवार, 12 जून 2020

श्रीमद्भगवदगीता_के_गूढ़_रहस्य

श्रीमद्भगवदगीता_के_गूढ़_रहस्य

गीता अध्याय 16 श्लोक 23
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से
मनमाना आचरण करता है..
वह न सिद्धि को प्राप्त होता है।
न उसे कोई सुख प्राप्त होता है,
न उसकी गति यानि मुक्ति होती है
अर्थात्

शास्त्र के विपरित भक्ति करना व्यर्थ है।




वास्तविक भक्ति विधि के लिए गीता ज्ञान दाता प्रभु (ब्रह्म) किसी तत्वदर्शी की खोज करने को कहता है (गीता अध्याय 4 श्लोक 34) इस से सिद्ध है गीता ज्ञान दाता (ब्रह्म) द्वारा बताई गई भक्ति विधि पूर्ण नहीं है।


गीता अध्याय 15 के श्लोक 4 में कहा है कि उस तत्वदर्शी संत के मिल जाने के पश्चात् उस परमेश्वर के परम पद की खोज करनी चाहिए अर्थात् उस तत्वदर्शी संत के बताए अनुसार साधना करनी चाहिए जिससे पूर्ण मोक्ष(अनादि मोक्ष) प्राप्त होता है। गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मैं भी उसी की शरण में हूँ।

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