गुरुवार, 7 मई 2020

जन्म मरण का मूल कारण कौन है? तथा इस से छूटने का उपाय क्या है?



संत गरीबदास जी महाराज ने इसका उत्तर दिया है कि इस जन्म-मरण का मूल कारण अविद्या यानि तत्वज्ञान का अभाव है। जिस कारण से जन्म-मरण के फेर यानि चक्र को नहीं समझ सके जो कर्मों के कारण हो रहा है। सत्य भक्ति के अभाव से पाँच तत्व तथा पच्चीस प्रकृति अपने स्वभाव से कर्म कराकर जीवन नष्ट करा देती है। फिर अपने-अपने भागों में बाँट ले जाती है।सत्यनाम बिन यह शरीर रूपी नगर सूना (खाली) है। इस शरीर में इच्छाओं तथा इच्छा पूर्ण न होने की चिंता तथा अन्य दुःख-सुख का ढ़ोल बज रहा है, शोर हो रहा है। जैसे लड़का उत्पन्न हुआ तो खुशी का शोर। उस शोर में भगवान भूल गया। फिर लड़का मर गया। फिर दुःख की रोहा-राट (हाहाकार) रूपी शोर। उस शोर में परमात्मा की भूल।


इस प्रकार यह जीवन इस चूं-चूं में समाप्त हो जाता है। कभी धन इकट्ठा करने के विचारों का शोर।
इस प्रकार मानव शरीर का मूल कार्य छोड़कर जीवन अंत कर दिया। लूट न लूटि बंदगी यानि राम नाम इकट्ठा नहीं किया। हे हंस, हे भोले मानव! भोर हो गया यानि मृत्यु हो गई। जैसे भोर (सुबह) नींद खुलती है, स्वपन समाप्त होता है तो स्वपन में बना राजा अपनी झौंपड़ी में खटिया पर पड़ा होता है। इसी प्रकार मानव शरीर रहते भक्ति नहीं की तो मृत्यु उपरांत पशु-पक्षी वाली योनि रूपी खटिया पर पड़ा होगा यानि पशु-पक्षी बनकरकष्ट पे कष्ट उठाएगा।

गरीब,  अगम निगम को खोज ले, बुद्धि विवेक विचार।
            उदय-अस्त का राज दे, तो बिन नाम बेगार।।

अधिक जानकारी के लिए कृपया अवश्य सुने
संत रामपाल जी के  मंगल प्रवचन
साधना चैनल शाम 7:30 से 8:30 तक।

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